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बच्चों के प्रति क्रूर होता समाज

Posted On: 14 Jan, 2014 Others,लोकल टिकेट,social issues में

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घर से भागा हुआ बच्चा पवन कुमार
इस बच्चे का नाम है पवन कुमार । ये बच्चा मुझे अपने गृहनगर मधुबनी बिहार से दिल्ली की वापसी रेल यात्रा में , अपने रेल के डब्बे में बैठा मिला । असल में ये बच्चा शायद मुजफ़्फ़रपुर या छपरा स्टेशन में से किसी स्टेशन पर रेल में सवार हो गया था । मेरा ध्यान इस बच्चे पर तब गया जब आसपास बैठे यात्रियों को इस बालक से चुहल करते देखा । कोई इसे जूस के दुकान पर काम करने को तैयार कर रहा था तो कोई इसे जेबकतरा कह के दुत्कार रहा था । आशंका होने पर मैं इसके पास गया और पहले मैंने सहयात्रियों से पूछा कि क्या ये बच्चा किसी के साथ है । इंकार करने पर मैंने इस बच्चे से इसका नाम और पता पूछा ।
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बच्चा अचानक ही मुझे यूं पूछते देख झिझक कर डर कर चुप होगा , मगर मेरे बार बार पुचकारने पर बताया कि वो अपनी नानी के घर से भाग कर आया है बच्चे ने ये भी बताया कि वो पहले भी दो बार भाग चुका है । मझे अंदेशा हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्चा अपने हो रहे किसी जुल्म सितम से डर कर भाग खडा हुआ था , मगर प्यार से पूछने पर उसने बताया कि वो नौकरी करने जा रहा है । मुझे उसे बहुत ही सावधानी से समझाना पडा कि अभी वो बहुत छोटा है और उसे कम से कम उस उम्र तक तो इंतज़ार करना ही चाहिए जब तक वो नौकरी के लायक शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व न हो जाए । बच्चा अब घर जाने को तैयार था । मैंने अगले स्टेशन (बलिया) पर उतर कर फ़ौरन ही स्टेशन अधीक्षक के दफ़्तर पहुंच कर सारी बात बताई और इस मासूम को उनके सुपुर्द किया ।
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मैं जब ये पोस्ट लिख रहा हूं तो टेलिविजन चैनल पर समाचार आ रहा है कि मुंबई के मीरा रोड पर पुलिस ने एक ११ वर्षीय बच्चे को छुडाया है जिसे जबरन मार पीट और भयंकर शोषित करके घर में बंधक बना कर काम कराया जा रहा था और इस तरह की घटना या खबर अब रोज़मर्रा की बात सी हो गई है । ऐसा लग रहा है मानो इस समाज को बच्चों के प्रति कोई संवेदना , कोई सहानुभूति , कोई चिंता नहीं है । किसी समाजशास्त्री ने ऐसी स्थिति को भांप कर ही कहा था कि जो देश और समाज कल का भविष्य बनने वाले बच्चों के प्रति असहिष्णु और लापरवाह होता है उसे फ़िर बदले में हिंसक और क्रूर नस्लें ही मिलती हैं ।
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राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकडों पर नज़र डालें तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा लग जाता है ।सिर्फ़ पिछले पांच वर्षों में बच्चों के प्रति हिंसा और अपराध की घटनाओं में 21 %  का इज़ाफ़ा हुआ है । इन अपराधों में भी सबसे ज्यादा घटनाएं अपहरण , हत्या और शोषण की हैं । इतना ही नहीं प्रति वर्ष देश भर से गुमशुदा बच्चों की दर में भी लगातार वृद्धि हो रही है और चौंकाने वाली बात ये है कि छोटे शहरों , गांव , कस्बों से बहला फ़ुसला कर , घर से भाग कर , या किसी और कारणों से गायब हुए बच्चों के अलावा महानगरों और बडे शहरों में ये दर कहीं अधिक है । इसका मतलब स्पष्ट है कि पुलिस , प्रशासन व सरकार बच्चों के जीवन व सुरक्षा के प्रति घोर उदासीन व असंवेदनशील रवैया अपनाए हुए है ।
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महानगरों में बच्चों को बंधक मजदूरी , भिक्षावृत्ति , तथा अन्य शोषणों से लगातार त्रस्त होना पड रहा है और सरकार तथा कुछ स्व्यं सेवी संस्थाओं के लगातार प्रयासों के बावजूद भी \स्थिति निरंतर बिगडती ही जा रही है । पिछले दिनों तो गरीब बच्चों का अपहरण करके उनकी हत्या के बाद मानव अंगों के व्यापार हेतु उनका प्रयोग किए जाने जैसी अमानवीय और घिनौनी घटनाएं भी सामने आई हैं । आश्चर्य व दुख इस बात का है सरकार ने अब तक इन नौनिहाल मासूमों की सुरक्षा व संरक्षण हेतु कोई ठोस नीति या योजना न तो बनाई है और न ही कोई प्रयास किया है । महज़ आंकडों की बाजीगरी और कागज़ी कोशिशों के सहारे ही प्रशासन अपने प्रयास गिनाने में लगा रहता है ।
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यदि यही स्थिति रहती है तो फ़िर निश्चित रूप से समाज को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि भविष्य में हालात और भी नारकीय हो जाएंगे । सरकार को समाज और स्व्यं सेवी संस्थाओं , समूहों , सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर इस दिशा में एक दूरगामी रोडमैप बना कर आपसी तालमेल के साथ वृहत योजना बनानी चाहिए । संचार क्रांति के इस युग में कम से कम गुमशुदा बच्चों की तलाश तो पूरी संज़ीदगी से की ही जानी चाहिए , ताकि समय रहते ऐसे भूले भटके बच्चों को उनके घर तक पहुंचाया जा सके ।


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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
January 16, 2014

बाल जीवन के दुर्भाग्य और व्यवस्था की विसंगति के साथ, अत्यंत सारगर्भित प्रस्तुति, प्रभावपूर्ण; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

yogi sarswat के द्वारा
January 17, 2014

महानगरों में बच्चों को बंधक मजदूरी , भिक्षावृत्ति , तथा अन्य शोषणों से लगातार त्रस्त होना पड रहा है और सरकार तथा कुछ स्व्यं सेवी संस्थाओं के लगातार प्रयासों के बावजूद भी \स्थिति निरंतर बिगडती ही जा रही है । पिछले दिनों तो गरीब बच्चों का अपहरण करके उनकी हत्या के बाद मानव अंगों के व्यापार हेतु उनका प्रयोग किए जाने जैसी अमानवीय और घिनौनी घटनाएं भी सामने आई हैं । आश्चर्य व दुख इस बात का है सरकार ने अब तक इन नौनिहाल मासूमों की सुरक्षा व संरक्षण हेतु कोई ठोस नीति या योजना न तो बनाई है और न ही कोई प्रयास किया है । महज़ आंकडों की बाजीगरी और कागज़ी कोशिशों के सहारे ही प्रशासन अपने प्रयास गिनाने में लगा रहता है । इनके लिए संस्थाएं हैं लेकिन वो संस्थाएं सिर्फ अपनी तनख्वाह और सरकारी सुविधा पाने के लिए ही कभी कभी काम करती हैं और वो भी तब जब मीडिया का साथ होता है जिससे इनकी रिपोर्ट को बल मिल सके ! ऐसे एक नहीं हजारों बच्चे हैं अजय जी !

ajaykumarjha के द्वारा
January 17, 2014

आपका बहुत बहुत शुक्रिया संतलाल करूण जी

ajaykumarjha के द्वारा
January 17, 2014

हां आप बिल्कुल सच कह रहे हैं योगी सारस्वत जी । आपसे सहमत हूं । प्रतिक्रिया देने के लिए शुक्रिया

abhishek shukla के द्वारा
January 18, 2014

इंसान इतना गिर गया है की अपना स्वार्थ साधने के लिए नरभक्षी भी बन सकता है,काम पे रखना तो छोटी बात है, ….सार्थक प्रयत्न, आभार!

ajaykumarjha के द्वारा
January 18, 2014

प्रतिक्रिया देने के लिए आपका आभार और शुक्रिया अभिषेक शुक्ला जी


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